Saturday, 27 June 2026

दिलवालों की दिल्ली में महाराष्ट्र

दिलवालों की दिल्ली में महाराष्ट्र 

दिलवालों की दिल्ली में महाराष्ट्र 

कभी कभी उम्र बीत जाती रिश्ते बनाने में,
और कभी चुटकियों में गुज़र जाता साल 
नये बने रिश्तों में,
वक्त पैमाना नही, प्रेम के इस खेल में,
कुछ रिश्ते कभी बनते नहीं,
कुछ बन जाते पल दो पल में.
संगीत के पुराने रिकॉर्ड की तरह अनोखी,
दिलकश और गहरी,पुरानी दिल्ली की तरह.
तीन पहियों वाली साइकिल रिक्शा-सी,
जो खुद चलती, औरों को भी साथ ले जाती
सफर को सुहाना बनाती, हर मोड़ पर मुस्कुराती।
कभी आम महोत्सव की मिठास घोलती,
कभी गणेशजी का आशीष साथ लाती,
कभी खाद्य महोत्सव की खुशबू बिखेरती,
कभी हुर्डा पार्टी में देहातीपन जगाती,
कभी संक्रांत का तिलगुड़ देकर हाथों में 
हर पल अनूठा, हर लम्हा रसदार, 
हर बार नई बात बताती...
जैसे गीता मनीषी के आशीर्वचन देते गीता का ज्ञान,
मन लगाकर काम करो यही कर्म महान...
साड़ियों की बौछार में पैठनी  की चमक,
खण और करवत काठी की बुनावट की धमक,
फ़ैशन शो में उत्साह की रंगत आयी
और दिल्ली में महाराष्ट्र ने धूम मचाई!
सिर्फ़ मनोरंजन नहीं  एक संस्कृति बोलती ,
हर धागे में कोई कहानी मिलती।
महिला साहित्य सम्मेलन की बात थी कुछ और,
मंच मिला महिला अधिकारियों को, 
 रचा साहित्य बेजोड़।
सेवा में डूबी कलम जब काग़ज़ पर उतर आई,
तो अक्षर-अक्षर में गूँजी एक नई रोशनाई।
सिर्फ उत्सव नहीं, काम भी हुए बेजोड़
अटके प्रमोशन को मिले मोड़
रुकी अनुकम्पाओं का खुल गया दौर
मिली किसी को राहत और मुझे समाधान 
 कर्त्तव्य में तत्परता, इसी में निहित सम्मान!
दफ़्तर की फाइलों में जो नहीं था नसीब,
वो एक मुलाकात और बातचीत में हो गया करीब
सुना था , दिल्ली है दिलवालों की,
पर  महाराष्ट्र से भी आयी दिली बहार
 और खिल गए दिल्ली में फूल हज़ार
महाराष्ट्र सदन बना अपनेपन का द्वार।
महाराष्ट्र से आयी और दिल्लीने अपनाया,
और दिल्ली ने महाराष्ट्र को अपने दिल में बसाया।
उम्र से नहीं, रिश्ते दिल से बनते हैं,
नियति जिनको जोड़े, वो कहाँ टूटते हैं।
कोसों दूर है दिल्ली, फिर भी दिल पर राज करती है,
ज्ञान, धर्म, कर्म की भूमि का यही तो हैं सार 
जहाँ हृदय जुड़ते हैं, वहीं ईश्वर का हैं साक्षात्कार । 

आर. विमला, भा.प्र.से. (सेवानिवृत्त), महाराष्ट्र–2009
पूर्व निवासी आयुक्त एवं सचिव, महाराष्ट्र शासन
संस्थापक, अनिर्वेदशक्ति फाउंडेशन
पीएच.डी. शोधार्थी, सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़, IIT बॉम्बे

No comments:

Post a Comment

The sacredness of a promise...

The sacredness of a promise... Some lessons cannot be taught by books but can only be learnt through life. Over the past few months, I have ...